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डिजायर न्यूज़ -नई दिल्ली, जान क्या है ये सिर्फ इंसान अपने लिये जानता है , लेकिन अगर हम देखे तो जानवरो में भी वही जान है जिसे हम अपने पेट के स्वाद के लिये मार कर खा जाते है , या हम अपनी मानसिक सोच के कारण उनपर जुल्म करने से भी नहीं डरते है।  जब की जानवर इंसानो के लिये जितने वफ़ादार है उतना इंसान इन के लिये नहीं है। आज आप के सामने इस लेख का एक मक़सद है क्यों की हमारी संस्था डिजायर 4 लाइफ जानवरो के बचाव के लिये काम कर रही है , आप भी इसके साथ जुड़ कर जानवरो की मदद कर सकते है , और साथ साथ लोगो को अवगत करा सकते है।  आज हम सिर्फ गौ माता की बात करते है क्यों की हमारे शास्त्रों में गौ माता की सेवा करने से स्वर्ग मिलने की बात कही गई है लेकिन क्या कभी हमने सोचा है की जान तो सब की एक ही हैं और सब को बनाने वाला भी भगवान ही हैं।  आज जानवर सिर्फ बोल नहीं पाते है पर वो हम से ज्यादा समझदार हैं हमारी सब बातो को बड़ी आसानी से समझ लेते है।  

डिजायर न्यूज़ आज आप को जीव जंतु से जुड़े कुछ कानून के बारे में बता रहा है , क्या आप जीव-जंतु के इन  अधिकारों के बारे में जानते हैं? भारतीय संविधान हर नागरिक को जीने का अधिकार देता है यह बात आपने कई बार सुनी होगी। लेकिन भारत के संविधान ने जानवरों को भी जीवन जीने की आजादी दी है। अगर इनके जीवन को बाधित करने का कोई प्रयास करता है तो इसके लिए संविधान में कई तरह के दंड़ के प्रावधान हैं। इतना ही नहीं इनमें से 10 जानवरों ऐसे भी हैं जिनको मारने पर आपको जेल भी हो सकती है। आज हम ऐसे ही जानवरों और उनकी रक्षा के लिए बने कुछ कानून के बारे में आपको बताएंगे।  

क्या आप जानते हैं कि भारत में सिर्फ मानवाधिकार ही नहीं हैं, बल्कि पशुओं के कानूनी अधिकार भी हैं? हालाँकि ऐसे समय में जब सत्ता समर्थक लोगों को मानवाधिकार भी फिजूल लगते हों, तब हमें जानना चाहिए कि पशुओं को कौन से कानूनी अधिकार प्राप्त हैं। और एक बात हमे कानून जानने से फ़ायदा ज्यादा नहीं है ये कभी इस्तेमाल ना हो ऐसा डिजायर न्यूज़ का प्रयास है , हमे जानवरो की रक्षा के लिये काम करना है,  ना की कानून में कितनी सजा है इसको देख कर उनपर अत्याचार करना  है। हर नागरिक का  कर्तव्य  - भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 (ए) के मुताबिक हर जीवित प्राणी के प्रति सहानुभूति रखना भारत के हर नागरिक का मूल कर्तव्य है।

कोई भी पशु (मुर्गी समेत) सिर्फ बूचड़खाने में ही काटा जाएगा। बीमार और गर्भ धारण कर चुके पशु को मारा नहीं जाएगा। प्रिवेंशन ऑफ क्रुएलिटी ऑन एनिमल्स एक्ट और फूड सेफ्टी रेगुलेशन में इस बात पर स्पष्ट नियम हैं। वन्य जीव संरक्षण कानून क्या है ? जानवरों पर हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1972 में भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम पारित किया था। इसका मकसद वन्य जीवों के अवैध शिकार, मांस और खाल के व्यापार पर रोक लगाना था। इसमें वर्ष 2003 में संशोधन किया गया जिसका नाम भारतीय वन्य जीव संरक्षण (संशोधित) अधिनियम 2002 रखा दिया गया। इसमें दंड और और जुर्माना को और भी कठोर कर दिया गया है।

पशुओं पर पशुता न करें - भारतीय दंड संहिता की धारा 428 और 429 के मुताबिक किसी पशु को मारना या अपंग करना, भले ही वह आवारा क्यों न हो, दंडनीय अपराध है।  अगर किसी ने जानवर को जहर दिया, जान से मारा, कष्ट दिया तो उसे दो साल तक की सजा हो सकती है। इसके साथ ही कुछ जुर्माने का भी प्रावधान है।

बंदर पालना -  वाइल्डलाइफ एक्ट के तहत बंदरों को कानूनी सुरक्षा दी गई है। कानून कहता है कि बंदरों से नुमाइश करवाना या उन्हें कैद में रखना गैरकानूनी है। पशु को आवारा बनाना - प्रिवेंशन ऑफ क्रूएलिटी ऑन एनिमल्स एक्ट (पीसीए) 1960 के मुताबिक किसी पशु को आवारा छोड़ने पर तीन महीने की सजा हो सकती है।

 डॉग्स रूल - इस नियम के तहत कुत्तों को दो श्रेणियों में बांटा गया है। पालतू और आवारा। कोई भी व्यक्ति या स्थानीय प्रशासन पशु कल्याण संस्था के सहयोग से आवारा कुत्तों का बर्थ कंट्रोल ऑपरेशन कर सकती है। उन्हें मारना गैरकानूनी है। भारत सरकार के एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल (2001) के अनुसार किसी भी कुत्ते को एक स्थान से भगाकर दूसरे स्थान में नहीं भेजा जा सकता। अगर कुत्ता विषैला है और काटने का भय है तो आप पशु कल्याण संगठन में संपर्क कर सकते हैं। भारत सरकार के एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल (2001) की धारा 38 के अनुसार किसी पालतू कुत्ते को स्थानांतरित करने के लिए चाहिए कि उसकी उम्र 4 माह पूरी हो चुकी हो। इसके पहले उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना अपराध है।

पशुओं की देखभाल - जानवर को पर्याप्त भोजन, पानी, शरण देने से इनकार करना और लंबे समय तक बांधे रखना दंडनीय अपराध है। इसके लिए जुर्माना या तीन महीने की सजा या फिर दोनों हो सकते हैं।प्रिवेंशन ऑन क्रूशियल एनिमल एक्ट 1960 की धारा 11(1) कहती है कि पालतू जानवर को छोड़ने, उसे भूखा रखने, कष्ट पहुंचाने, भूख और प्यास से जानवर के मरने पर आपके खिलाफ केस दर्ज हो सकता है। इसपर आपको 50 रुपए का जुर्माना हो सकता है। अगर तीन महीने के अंदर दूसरी बार जानवर के साथ ऐसा हुआ तो 25 से 100 रुपए जुर्माने के साथ 3 माह की जेल सकती है।  जानवरों को लंबे समय तक लोहे की सांकर या फिर भारी रस्सी से बांधकर रखना अपराध की श्रेणी में आता है। अगर आप जानवर को घर के बाहर नहीं निकालते तो यह भी कैद माना जाता है। ऐसे अपराध में 3 माह की जेल और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

पशुओं को लड़ाना - पशुओं को लड़ने के लिए भड़काना, ऐसी लड़ाई का आयोजन करना या उसमें हिस्सा लेना संज्ञेय अपराध है। मंदिरों और सड़कों जैसे स्थानों पर जानवरों को मारना अवैध है। पशु बलिदान रोकने की जिम्मेदारी स्थानीय नगर निगम की है। पशुधन अधिनियम, 1960, वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत ऐसे करना अपराध है।

एनिमल टेस्टिंग-  ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक रूल्स 1945  के मुताबिक जानवरों पर कॉस्मेटिक्स का परीक्षण करना और जानवरों पर टेस्ट किये जा चुके कॉस्मेटिक्स का आयात करना प्रतिबंधित है। बलि पर बैन -  स्लॉटरहाउस रूल्स 2001 के मुताबिक देश के किसी भी हिस्से में पशु बलि देना गैरकानूनी है

चिड़ियाघर का नियम - चिड़ियाघर और उसके परिसर में जानवरों को चिढ़ाना, खाना देना या तंग करना दंडनीय अपराध है। पीसीए के तहत ऐसा करने वाले को तीन साल की सजा, 25 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

पशुओं का परिवहन , पशु परिवहन अधिनियम-  पशुओं को असुविधा में रखकर, दर्द पहुंचाकर या परेशान करते हुए किसी भी गाड़ी में एक जगह से दूसरी जगह ले जाना मोटर व्हीकल एक्ट और पीसीए एक्ट के तहत दंडनीय अपराध है। ट्रांसपोर्ट ऑफ एनिमल रूल्स, 1978 की धारा 98 के अनुसार, पशु को स्वस्थ और अच्छी स्थिति में ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना चाहिए। किसी भी रोग ग्रस्त, थके हुए जानवर को यात्रा नहीं करानी चाहिए। ऐसा करना अपराध है।

कोई तमाशा नहीं - पीसीए एक्ट के सेक्शन 22(2) के मुताबिक भालू, बंदर, बाघ, तेंदुए, शेर और बैल को मनोरंजन के लिए ट्रेन करना और इस्तेमाल करना गैरकानूनी है।

घोंसले की रक्षा - पंछी या सरीसृप के अंडों को नष्ट करना या उनसे छेड़छाड़ करना या फिर उनके घोंसले वाले पेड़ को काटना या काटने की कोशिश करना शिकार कहलाएगा। इसके दोषी को सात साल की सजा या 25 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 16 (सी) के तहत जंगली पक्षियों या सरीसृपों को नुकसान पहुंचाना, उनके अंड़ों को नुकसान पहुंचाना, घोंसलों को नष्ट करना अपराध है। ऐसा करने का दोषी पाए गए व्यक्ति को 3 से 7 साल का कारावास और 25,000 रुपये का जुर्माना हो सकता है।

जंगली जानवरों को कैद करना - किसी भी जंगली जानवर को पकड़ना, फंसाना, जहर देना या लालच देना दंडनीय अपराध है। इसके दोषी को सात साल की सजा या 25 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
 
वन्य जीव संरक्षण कानून क्या है ?

जानवरों पर हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1972 में भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम पारित किया था। इसका मकसद वन्य जीवों के अवैध शिकार, मांस और खाल के व्यापार पर रोक लगाना था। इसमें वर्ष 2003 में संशोधन किया गया जिसका नाम भारतीय वन्य जीव संरक्षण (संशोधित) अधिनियम 2002 रखा दिया गया। इसमें दंड और और जुर्माना को और भी कठोर कर दिया गया है।

डिजायर न्यूज़ सिर्फ इतना ही अनुरोध करना चाहता है कि अगर आप किसी को जिंदगी दे नहीं सकते तो आप को उसकी जिंदगी लेने का भी अधिकार नहीं है अगर आप किसी जानवर की मदद नहीं कर सकते तो आप को जानवरो को तकलीफ देने का भी अधिकार नहीं है।  जान सब में एक सामान है , उन्हे भी हमे उनका हक़ देना चाहिए। 

संजीव शर्मा
एडिटर इन चीफ
07-03-2022 01:04 AM
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